Sunday, June 16, 2019

नारीवाद या फ़ेमिनिज़्म के सही मायने क्या हैं


आज जिसे देखो वो फ़ेमिनिज़्म के हक में बोलने के लिए जैसे तत्पर बैठा रहता है। ऊपर से देखें तो लगता है कि दुनिया में वाकई बदलाव आ गया है। अब लड़का और लड़की का भेद बिल्कुल ख़त्म हो गया है। पर क्या हक़ीकत असल में यही है? क्या हमारे समाज की सोच सच में बदल गई है? क्या हम आज भी अपनी बेटियों को रात में बेधड़क अकेले भेज सकते हैं? क्या लड़कियाँ छोटी ड्रेस पहनकर मेट्रो में सहज महसूस करती हैं? नहीं ना! इसका मतलब है कि हमें अभी भी अपने समाज की सोच में कई बदलाव लाने की ज़रूरत है।

हालाँकि हमारी सोच में बदलाव आया है। इसमें कुछ समाज का और कुछ सरकार का हाथ रहा है। उदाहरण के तौर पर, पहले लड़की पैदा होना अभिषाप माना जाता था, खासकर पिछड़े वर्गों में, और इसीलिए कितनी ही लड़कियाँ पैदा होने से पहले ही मार दी जाती थीं। पर अब सरकार द्वारा कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ बनाए गए सख्त कानूनों और साथ ही लड़कियों को आगे बढ़ाने के लिए बनाई गई नीतियों के चलते, अब बेटी पैदा होने पर पिता को खुशी महसूस होती है। यह मानसिकता धीरे धीरे पिछड़े वर्गों में भी पनप रही है, और वे भी बेटियों के अच्छे लालन-पालन पर ध्यान देने लगे हैं। यह सही मायने में फ़ेमिनिज़्म है।

फ़ेमिनिज़्म का असल अर्थ है नारी और पुरुष को समाज में समान स्थान मिलना, उनके समान अधिकार होना और उन्हें भी हर क्षेत्र में समान आज़ादी मिलना। बिल्कुल सही बात है। अगर हम सभी इस परिभाषा को सही रूप में अमल करें तो इससे अच्छा कुछ और हो ही नहीं सकता। पर प्रश्न यहीं से उठता है..अगर ऐसा ही करें तो....। प्रश्न इसलिए खड़ा होता है क्योंकि हम ऊपर से तो कहते हैं लड़का लड़की दोनो बराबर है, पर जब आपका बेटा रात को 9 से 12 की फ़िल्म देखने के लिए कहे तो आप उसे इजाज़त दे देते हैं, पर अगर यही बात आपकी बेटी पूछे तो उसे यह इजाज़त नहीं मिलती। इसके पीछे माता-पिता का डर एकदम वाज़िब है। तो, यह डर कैसे कम हो? क्योंकि जब तक लड़की बाहर सुरक्षित नहीं है, तब तक हम नहीं कह सकते कि उसे बराबरी का हक मिल गया। इसे सुनिश्चित करने के लिए ज़रूरी है कि पुरूष अपनी सोच बदलें। अगर 9 से 12 का शो देखने वाली लड़की के संस्कार अच्छे नहीं हैं, तो आप भी तो वही शो देख रहे हैं, तो आपके संस्कार अच्छे कैसे हुए? क्योंकि अगर आप यह करने के हकदार हैं, तो आपकी बहन भी उतनी ही हकदार है। हाँ, हर घर के अपने कुछ कायदे होते हैं, और उनका पालन करना बेटी और बेटे दोनों का कर्तव्य होता है। उसके ऊपर अतिरिक्त नियम कायदे क्यों लगें?

आज ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जहाँ लड़कियों ने अभी तक पुरुषों का वर्चस्व रहे क्षेत्रों में भी अपना सिक्का कायम किया है, जैसे प्रतिभा पाटिल (पहली महिला राष्ट्रपति), निर्मला सीतारमन (पहली महिला रक्षा मंत्री और वित्त मंत्री), तारिणी, जिसमें पाँ नेवी की महिला सैनिकों ने समुद्र मार्ग से विश्व भ्रमण किया।

अभी तक हमने बात की लड़कियों को हर क्षेत्र में बराबरी का हक देने की और उनके लिए एक सकारात्मक मानसिकता विकसित करने की। अब दोबारा गौर करें कि हमने कहा था कि नारी और पुरुष को समान हक मिलना फ़ेमिनिज़्म है, तो फिर हम उसे ऊपर क्यों रखना चाहते हैं? पुरुषों के बराबर क्यों नहीं? और अगर बराबर रखना है तो उसे समान अधिकार मिलते हैं, तो फिर कर्तव्य भी समान ही होने चाहिए! अगर वो माता-पिता की जायदाद में बराबर की हकदार है, तो उनकी देखभाल में भी बराबर की हकदार होनी चाहिए। माना कि आजकल हम कहते हैं कि बुढ़ापे में लड़का देखभाल करे न करे लेकिन बेटियाँ ज़रूर करती हैं। तो फिर यह तो होना ही चाहिए, इसमें हैरान होने जैसा क्या है?

यह तो हुई घर की बात, अब ज़रा घर से बाहर निकल कर फ़ेमिनिज़्म की समीक्षा करते हैं। महिला और पुरुष बराबर हैं तो मेट्रो और बसों में महिलाओं की विशेष सीटें क्यों? यह तो समानता नहीं हुई। विशेष सीटें आरक्षित होनी चाहिए विशेष ज़रूरत वाले व्यक्तियों के लिए, वह महिला भी हो सकती है और पुरुष भी। दूसरा पहलू, आप दिल्ली विश्वविद्यालय का उदाहरण ले लें, उसमें कई कॉलेज हैं जो महिलाओं के लिए ही हैं, उनमें लड़के दाखिला नहीं ले सकते। लेकिन, बाकी बचे कॉलेजों में लड़के और लड़कियाँ दोनों दाखिला ले सकते हैं। ऐसा क्यों?  क्या किसी ने सोचा कि लड़कों के लिए भी समान विशेष कॉलेज होने चाहिए? ये तो समानता नहीं हुई। एकदम यही हाल नौकरियों में भी है। हर जगह लड़कियों को विशेषाधिकार है। अगर लड़का और लड़की की काबलियत समान है (और हम तो कहते हैं लड़कियाँ ज़्यादा काबिल होती हैं), तो फिर अलग से गर्ल्स कोटा रखने की क्या ज़रूरत है?

आप सोच रहे होंगे कि इस लेखक की सोच समाज के एकदम विपरीत है, और आपको जानकर हैरानी होगी कि मैं भी एक महिला हूँ और फ़ेमिनिज़्म की कट्टर समर्थक हूँ, पर इसके असल अर्थ में। उस रूप में जहाँ महिलाओं को सही में बराबर का दर्जा मिले, न कि पुरुषों का कुछ छीन कर उन्हें दिया जाए। क्योंकि अगर ऐसा होगा तो वह बराबरी नहीं पक्षपात होगा।